‘नेता’ वही जो ‘शोषितों’, ‘पीड़िता और ‘वंचितों’ के ‘साथ’ खड़ा ‘रहें’!

‘नेता’ वही जो ‘शोषितों’, ‘पीड़िता और ‘वंचितों’ के ‘साथ’ खड़ा ‘रहें’!

‘नेता’ वही जो ‘शोषितों’, ‘पीड़िता और ‘वंचितों’ के ‘साथ’ खड़ा ‘रहें’!

  • -जनता उसे नेता नहीं मानती जो अपनी जाति और बिरादरी के साथ खड़ा रहें, नेता उसे मानती, जो सर्वसमाज के लिए खड़ा रहेें, इसके बाद भी अगर किसी को यह लगता है, कि वह सिर्फ अपनी जाति और बिरादरी के साथ खड़ा रह कर नेता बन सकतें हैं, तो वह गलतफहमी में जी रहें
  • -बाबूजी भी तभी नेता बने जब वह सर्वसमाज के लिए खड़े हुए, अगर वाकई किसी को बाबूजी जैसा नेता बनना है, तो पहले उसे विशेष जाति के नेता का चांगा उतारकर सर्वसमाज का नेता बनना पड़ेगा, जो लोग चौधरियों का नेता बन, सांसद और विधायक बनने का सपना देखने वाला व्यक्ति विधायक तो प्रधान भी नहीं बन सकता
  • -जनता उसे नेता नहीं मान सकती, जिसने विकास के नाम पर लूटपाट मचाया, जनता नेता उसे मानेगी जिसने विकास किया, हालांकि जिले में इस तरह का कोई नेता दिखाई नहीं दे रहा, जो हैं, जनता उन्हें नेता कम और अवसरवादी नेता अधिक मान रही

बस्ती। जिले में एक बहस छिड़ी हुई हैं, कि नेता कैसा हो? एक विशेष जाति का हो या फिर सर्वसमाज का। अधिकांश लोगों का कहना है, कि उनका नेता ऐसा हो जो शोषितों, पीड़ितों एवं वंचितों के हित के लिए खड़ा हो। यह भी कहते हैं, कि किसी विशेष जाति और बिरादरी को साथ में लेकर चलने वाला कभी सर्वसमाज का नेता नहीं हो सकता। अगर किसी को यह गलतफहमी है, कि वह विशेष जाति और बिरादरी को साथ में लेकर चलकर नेता बन सकते हैं, तो उन्हें अपनी सोच बदलनी होगी। थाना या कोतवाली से छुड़ाकर कोई नेता नहीं बन सकता। कुछ लोगों की हमदर्दी तो ली जा सकती है, लेकिन नेता नहीं बना जा सकता और न कोई सरकारी धन का लूटपाट करने वाला व्यक्ति ही कभी नेता बन सकता। ऐसे लोग विधायक तो क्या प्रधान तक नहीं बन सकते? अगर जनता का प्रतिनिधि किसी को बनना हैं, तो उसे जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा। जनता के बीच एक अच्छी छवि बनानी होगी। सरकारी धन का लूटपाट करने वाला न कभी जनप्रतिनिधि और न कभी नेता बन सकता है। नेता बनना हैं, तो नेताओं जैसा व्यवहार और चाल-चलन भी रखना होगा। किसी की मदद या फिर सहायता करके कुछ समय के लिए मदद करने वाला का हमदर्द तो बना जा सकता है, लेकिन नेता नही।

आज कल जिस तरह चौधरियों का नेता और मसीहा बनने के लिए होड़ लगी हुई, उससे समाज में एक गलत संदेश जा रहा है। इस होड़ में भाजपा और सपा के नेता शामिल है। बाबूजी का सफल राजनैतिक कैरियर देख कर तमाम लोग उन्हीं जैसा बनना चाहते हैं। ऐसे लोगों को यह नहीं मालूम कि बाबूजी किसी विशेष वर्ग का नेता नहीं बल्कि सर्वसमाज के नेता है। भले ही उनकी पहचान कुर्मी नेेता के रुप में हो, लेकिन वह सभी वर्ग को साथ में लेकर चले हैं, अगर न चले होते तो इतनी बार विधायक और सांसद न बनते। जो लोग चौधरियों का नेता बनने का प्रयास कर रहे हैं, वे लोग चौधरियों को गुमराह कर रहे हैं। एक तरह से जातिगत समीकरण सेट करने में होड़ लगी हुई है। देखना यह है, कि नवागत प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी इसे किस रुप में देखते हैं, क्यों कि अब लोगों को यह लगने लगा कि अगर वे चौधरी का नेता बनने में सफल हुए तो 27 में टिकट मिल सकता है, क्यों कि उनकी जाति का प्रदेश अध्यक्ष जो है। यह भी सही है, कि किसी भी चुनाव में चौधरी वर्ग एक निर्णायक भूमिका में रहता है। अधिकांश मतदाता भी जाति को देखकर वोट करते है। यही कारण है, कि लोग जाति की राजनीति में अपने आपको स्थापित करना चाहते है। बिरादरी के नाम पर नेता कभी-कभी गलत लोगों का साथ दे देतें है। जिससे छवि बनने के बजाए और बिगड़ जाती है। नेताओं को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए, कि किसी गलत व्यक्ति का साथ न दें। लोगों को यह गलतफहमी भी दूर कर लेनी चाहिए कि वह एक जाति या बिरादरी का नेता बन गएं है। चंद्रेश प्रताप सिंह कहते हैं, कि जिले की राजनीति का ध्रुवीकरण जिले के प्रथम नागरिक, जाति-जाति और एफआईआर-एफआईआर का खेल खेल रहें है। ईश्वर ही बस्ती जिले का बेड़ा पार करें यहां तो बेड़ा गर्त हो रहा है। कहते हैं, कि जातिवाद की एक गहरी खाई जो बस्ती में खोदी गई और उसे समुंदर बनाया जा रहा है यह न बस्ती के विकास अपितु आम जनमानस के लिए ठीक नहीं है।

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