मत करिए, ‘रेडक्रास सोसायटी’ को ‘प्राइवेट कंपनी’ की तरह ‘चलाने’ का ‘प्रयास’!

मत करिए, ‘रेडक्रास सोसायटी’ को ‘प्राइवेट कंपनी’ की तरह ‘चलाने’ का ‘प्रयास’!

मत करिए, ‘रेडक्रास सोसायटी’ को ‘प्राइवेट कंपनी’ की तरह ‘चलाने’ का ‘प्रयास’!

बस्ती। अगर समाज सेवा के क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी संस्था रेडक्रास सोसायटी का सभापति कार्यकारिणी की बैठक तक न करवा सके, तो ऐसे सभापति को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, ताकि संस्था की छवि खराब न हों। जिस तरह चंद लोगों के चलते रेडक्रास सोसायटी की छवि खराब हो रही है, उससे लगता है, कि चंद लोग इस संस्था को मनमानी तरीके से संचालित करना चाहते हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो पहले दस में से सात कार्यकारिणी के सदस्य अविष्वास प्रस्ताव न लाते और न नए साल के दूसरे दिन बुलाई गई बैठक का बहिष्कार ही करते। सवाल उठ रहा है, कि आखिर क्या समझकर सभापति डा. प्रमोद कुमार चौधरी, सचिव रंजीत श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष राजेश ओझा और उप सभापति लक्ष्मीकांत पांडेय रेडक्रास सोसायटी का संचालन करना चाहते हैं, क्या इन लोगों के दिमाग में इतनी छोटी सी बात क्यों नहीं समझ में आती कि इतनी बड़ी संस्था का संचालन बिना सबके सहयोग के नहीं चल सकता? एक केजी क्लास में पढ़ने वाला बच्चा समझ सकता है, तो क्यों नहीं पढ़े लिखे लोग समझ पा रहे हैं, आखिर समस्या कहां हैं, और क्या है? क्यों कि संस्था को नियम कानून से संचालित किया जा रहा है? सच तो यह है, कि चार लोगों को उसी दिन यह बात समझ में आ जानी चाहिए थी, जिस दिन कार्यकारिणी के अशोक कुमार सिंह, संतोष सिंह, हरीश सिंह, कुलवेंद्र सिंह मजहबी, इमरान, उमेश श्रीवास्तव और राहुल श्रीवास्तव ने नई कार्यकारिणी के प्रति अविष्वास प्रकट किया था। अगर उसी दिन सच को स्वीकार कर लेते तो दो जनवरी 26 की बैठक में सभी सदस्य मौजूद होते। जबकि अशोक कुमार सिंह ने सचिव को लिखा भी था, कि कार्यकारिणी की पहली बैठक डीएम की अध्यक्षता में होनी चाहिए, और बैठक होटल में न करके डीएम सभागार में होनी चाहिए। बैठक को स्थगित करने की अपील भी की गई। बैठक होने से पहले अगर सभी सदस्यों को विष्वास में लिया गया तो बैठक सफल भी होती, और संस्था को बेहतर तरीके से चलाने में सहयोग और सुझाव भी मिलता। लेकिन ऐसा लगता है, मानो कुछ लोग इस सामाजिक संस्था को एक प्राइवेट कंपनी की तरह संचालित करना चाहते है। अगर कुछ लोगों को यह गलतफहमी है, कि वह बस्ती सें लेकर लखनउ तक मैनेज कर लेगें, तो वे लोग गलत सोच रहे हैं, और गलत दिशा की ओर जा रहे है। ऐसे लोगों को कम से कम अपने उस शपथ को याद कर लेना चाहिए, जो उन्होंने लिया था। बहुत ही किस्मत वालों को रेडक्रास सोसायटी के जरिए समाज की सेवा करने का मौका मिलता है, अगर उपर वाले ने यह मौका दिया है, तो उसका उपयोग करें, न कि दुरुपयोग। रेडक्रास सोसायटी के हर सदस्य का यह दायित्व हैं, कि वह मिलजुल कर संस्था के नाम के अनुरुप समाज के अंतिम पायदान वाले व्यक्ति तक पहुंचे और उसकी सेवा करें। कार्यकारिणी के बैठक की अध्यक्षता डीएम कराते हैं, या फिर नहीं कर सकते हैं, इस पर तो सवाल उठ सकता है, लेकिन बैठक का बहिष्कार करना बड़ी बात हैं, और वह भी पहली बैठक। नई कार्यकारिणी को इस पर विचार करना चाहिए न कि यह कहना चाहिए, कि डीएम कार्यकारिणी की बैठक की अध्यक्षता नहीं बल्कि एजीएम की करतें है। अगर नई कार्यकारिणी यह चाहती है, कि रेडक्रास सोसायटी की बदनामी न हो तो इसके लिए सभापति डा. प्रमोद कुमार चौधरी, सचिव रंजीत श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष राजेश ओझा और उप सभापति लक्ष्मीकांत पांडेय को पहल करनी चाहिए, क्यों कि सात सदस्यों ने अविष्वास उन पर जताया है। जिस संस्था को समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने पर मीडिया की सुर्खियों में होना चाहिए, वह संस्था आज अपने लोगों के ही सवालों के घेरें में है।

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