‘रेडक्रास सोसायटी’ में सदस्यता ‘शुल्क’ के ‘नाम’ पर ‘फर्जीवाड़ा’

‘रेडक्रास सोसायटी’ में सदस्यता ‘शुल्क’ के ‘नाम’ पर ‘फर्जीवाड़ा’

‘रेडक्रास सोसायटी’ में सदस्यता ‘शुल्क’ के ‘नाम’ पर ‘फर्जीवाड़ा’

बस्ती। जब से रेडक्रास सोसायटी के नई कार्यकारिणी का गठन हुआ, तब से विवादों में रहा, जिस रेडक्रास सोसायटी को लोग जानते और पहचानते थे, वह अपनी पहचान खोता जा रहा है। चंद लोग मिलकर जो चाहते हैं, वह कर लेते हैं, कार्यकारिणी की मंजूरी तक नहीं ली जाती। आए-दिन विवाद होने के नाते सोसायटी अपने मूल उद्वेष्यों से भटक सा गया। कोई भी सेवा का कार्य मिलजुलकर नहीं हो रहा, सभी की भागीदारी न होने से यह दर्शाता हैं, कि रेडक्रास सोसायटी में एकता का अभाव है। सभी को साथ में लेकर चलने का काम सभापति और सचिव की होती है। अगर यही दोनों मनमानी करने लगेगें तो समाज में संदेष तो गलत जाएगा ही। अब सवाल उठ रहा है, कि सदस्यता शुल्क की धनराशि किस नियम और अधिकर के तहत स्थानीय खाते में रखी जा रही है। हालही में 221 नए आजीवन सदस्यों से कुल दो लाख 21 हजार की धनराशि प्राप्त की गई, जो अलग-अलग तिथियों में स्थानीय स्तर पर जमा किया गया, जबकि 30 फीसद अशंदान राज्य शाखा में जमा करने का प्रावधान है। सवाल उठ रहा है, कि रेडक्रास सोसायटी कोई नीजि संस्था नहीं हैं, कि जब चाहा और जहां चाहा मनमाने तरीके से धन को जमा कर दिया। सवाल यह भी उठ रहा है, कि जब तक राज्य का अंषदान नहीं जाएगा, तब तक सदस्यता नहीं मानी जाएगी। हो सकता है, कि इसमें भी कोई साजिश हो। आजीवन सदस्य राजेंद्रनाथ तिवारी ने कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि रेडक्रास सोसायटी के सदस्यता शुल्क को स्थानीय खाते में रखने का जब कोई प्रावधान नहीं तो क्यों रखा गया? और क्यों नहीं अभी तक राज्य का अशंदान भेजा गया। अध्यक्ष को इस बात को स्पष्ट करना चाहिए। कहा भी जाता है, कि समाज सेवा से जुड़ा कोई भी संगठन मनमाने तरीके से अपने उद्वेष्य में सफल नहीं हो सकती। वही संगठन अपने मकसद में सफल होता, जिसके सभी लोग मिलजुल कर कार्य करें। सबका साथ और सबका विष्वास से ही कोई संगठन चल सकता है। अध्यक्ष की ओर से अभी तक सबका साथ और सबका विष्वास का फारमूला अपनाया ही नहीं गया, जिसके चलते आपस में विवाद की स्थित उत्पन्न हो रही है, और जिसके चलते रेडक्रास सोसायटी की गरिमा गिर रही है। कार्यकारिणी की बैठक न होना इस बात को दर्शाता है, कि रेडक्रास सोसायटी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है, और इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार सोसायटी के अध्यक्ष और सचिव को माना जा रहा है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि चंद लोग मिलकर रक्तदान शिविर का आयोजन करते, और इसकी जानकारी सदस्यों को नहीं हो पाती, इसी लिए रक्तदान अपेक्षित सफल नहीं होता, पहले जब भी सोसायटी की ओर से इस तरह का कोई कार्यक्रम होता था, तो सभी लोगों को इसकी जानकारी दी जाती थी, जिसे नहीं भी रहती थी, वह भी कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए पहुंच जाता था, लेकिन अब उस तरह के कार्यक्रम का आयोजन ही नहीं दिखाई पड़ता।

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