नेताजी, ‘जाति’ की ‘आग’ में मत ‘झोंकिए’, नहीं ‘तो’ जल जाएगा ‘जिला’!

नेताजी, ‘जाति’ की ‘आग’ में मत ‘झोंकिए’, नहीं ‘तो’ जल जाएगा ‘जिला’!

नेताजी, ‘जाति’ की ‘आग’ में मत ‘झोंकिए’, नहीं ‘तो’ जल जाएगा ‘जिला’!

  • -पार्टिंयां दलीय निष्ठा और दलीय विचार के स्थान पर जातीय निष्ठा को बढ़ावा दे रही, जातीय आधार पर मदद की जा रही
  • -अब नेता अपनी जाति की टीम बनाता है, जातीय नेता बनकर उभरना चाहते, पार्टियां उसी आधार पर टिकट भी देती
  • -दयाशंकर मिश्र ने जब भाजपा छोड़ा और बसपा में शामिल हुए तो ब्राहृमण लोग उनके साथ में हो लिए, जिसके चलते हरीश द्विवेदी की हार हुई
  • -पार्टियां नेता तराशने और गढ़ने के बजाए जातीय नेता खोज रही, अगर कोई जातीय नेता है, और उसके पास धन और बल दोनों हैं, तो पार्टियां ऐसे लोगों का षानदार वेलकम करती
  • -वहीं पर अगर राजेंद्रनाथ तिवारी और राजमणि पांडेय जैसा कोई नेता है, तो उसे पार्टियां किनारे लगा देती, क्यों कि यह लोग अच्छा नेता तो बन सकते हैं, लेकिन अच्छा मैनेजर नहीं बन सकते
  • -अगर आप जातीय अधार पर नेता और आप के पास धन और बल तो आइए टिकट ले जाइए, वरना दरी बिछाइए, पार्टियां नेता नहीं बल्कि एक ऐसा मैनेजर तलाशती है, जो धन कमवा सके और खुद कमा सके
  • -उदाहरण के लिए गिल्लम चौधरी को लिया जा सकता है, इन्हें इस लिए कुर्सी पर नहीं बैठाया क्यों कि इन्हें मिलकर बांट खाने वाला नहीं बल्कि अकेला खाने वाला नेता माना, वहीं सारे विरोध के बावजूद संजय चौधरी को बना दिया
  • -बड़े नेता, उन लोगों को नेता नहीं मानते जो घघौवा पुल पर उनका स्वागत करने के लिए एक दो गाड़ी लेकर जातें, उन्हीं को मानते जो गाड़ियों का काफिला लेकर जाते, भले ही चाहंे उनका कोई जनाधार हो या न हो

बस्ती। जिले के लाखों लोग ऐसे हैं, जो जाति-पाति की राजनीति पर न तो विष्वास करते हैं, और न मानते ही हैं, ऐसे लोगों की उन नेताओं से अपील हैं, जो जाति की राजनीति कर रहें और समाज में जाति का जहर बो रहें है। यह लोग ऐसे नेताओं से कहना चाहते है, कि जिले को जाति की आग में मत झांेकिए, वरना एक दिन पूरा जिला जलकर राख हो जाएगा, जिसमें वे लोग भी जलेगें जिन्होंने जाति की राजनीति को बढ़ावा दिया। जरुरतमंद की मदद अवष्य कीजिए, लेकिन यह जानकर मत कीजिए, कि वह आप की जाति वाला है। जिस भी नेता ने जाति देखकर मदद किया, वह न तो जाति वालों का रहा और न सर्वसमाज का। कोई भी नेता जाति विशेष की राजनीति करके न तो सांसद बन सकता और न विधायक। सांसद और विधायक बनना हैं, तो जाति विशेष का चांेगा उतारकर फेंकना होगा। क्यों कि आजतक कोई भी एक विशेष जाति के बल पर सांसद और विधायक नहीं बना, क्यों कि उसे जीतने के लिए उसकी जाति में उतना वोट ही नहीं होता, जब भी कोई चुनाव जीता उसमें सर्वसमाज का योगदान अवष्य रहा। कोई व्यक्ति विशेष वर्ग का नेता तो बन सकता है, लेकिन जीत नहीं सकता। अगर ऐसा होता तो बसपा कभी हारती ही नहीं। कोई चौधरी या ब्राहृमण कहने से उस वर्ग का नेता नहीं हो जाता, नेता वह होता जो सर्वसमाज की बात करता है, और सर्व समाज की भलाई के लिए लड़ता है। जो लोग अपने आपको जाति विशेष का नेता कहते हैं, उन्ही के बच्चे ही सबसे अधिक इंटरकास्ट मैरिज करते है।

कहना गलत नहीं होगा कि पार्टिंयां दलीय निष्ठा और दलीय विचार के स्थान पर जातीय निष्ठा को बढ़ावा दे रही, जातीय आधार पर मदद के लिए प्रोत्साहित कर रही है। अब नेता अपनी जाति की टीम बनाने लगा है, जातीय नेता बनकर उभरना चाहता, पार्टियां उसी आधार पर टिकट भी देती है। दयाशंकर मिश्र ने जब भाजपा छोड़ा और बसपा में शामिल हुए तो ब्राहृमण लोग उनके साथ में हो लिए, जो हरीश द्विवेदी के हार का एक कारण बना। पार्टियां नेता तराषने और गढ़ने के बजाए, जातीय नेता खोज रही, अगर कोई जातीय नेता है, और उसके पास धन और बल दोनों हैं, तो पार्टियां ऐसे लोगों का बाएं फैलाकर वेलकम करती हैं। वहीं पर अगर राजेंद्रनाथ तिवारी और राजमणि पांडेय जैसा कोई नेता है, तो उसे पार्टियां किनारे लगा देती, क्यों कि इनमें अच्छा नेता तो बनने के सारे गुण है, लेकिन अच्छा मैनेजर बनने का एक भी गुण नहीं। अगर आप जातीय अधार पर नेता हैं, और आप के पास धन और बल हैं, तो आइए टिकट ले जाइए, वरना दरी बिछाइए, पार्टियां नेता नहीं बल्कि एक ऐसा मैनेजर तलाशती है, जो धन कमवा सके और खुद कमा सके। उदाहरण के रुप में गिल्लम चौधरी को लिया जा सकता है, इन्हें इस लिए जिले के प्रथम नागरिक की कुर्सी पर नहीं बैठाया गया, क्यों कि इन्हें मैनेजर नहीं माना गया, वहीं सारे विरोध के बावजूद संजय चौधरी को इस लिए कुर्सी पर बैठा दिया, कि इन्हें मैनेजर माना गया, अब यह अलग बात हैं, कि यह उन लोगों के उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सके, जिन लोगों ने इन्हें सारे विरोध के बावजूद जिला पंचायत अध्यक्ष बना दिया, ऐसे लोगों को भी निराशा हाथ लगी जो यह सोचकर इन्हें कुर्सी पर बैठाया ताकि यह रुधौली विधानसभा के टिकट के दावेदार न बन सके। आज संजय चौधरी, रुधौली विधानसभा के लिए सबसे मजबूत दावेदार उभरकर सामने आ रहे है। यहां पर संजय जायसवाल ने संजय चौधरी की मदद जाति को देखकर नहीं किया, फायदे को देखकर किया, अब फायदा नहीं हुआ तो इसमें संजय चौधरी की क्या गलती। फायदा तो पूर्व सांसद सहित अन्य पांच विधायकों को भी अपेक्षानुसार नहीं हुआ। वर्तमान में यह जिस तरह अपने जाति वाले की मदद अपनी ही पार्टी के नेता के विरोधी का कर रहे हैं, उससे इन्हें कितना लाभ होगा और पार्टी को कितना नुकसान होगा, यह देखने वाला होगा।  कहा भी जाता है, कि बड़े नेता, उन लोगों को नेता नहीं मानते जो घघौवा पुल पर उनका स्वागत करने के लिए एक दो गाड़ी लेकर जातें, उन्हीं को मानते जो गाड़ियों का काफिला लेकर जाते, भले ही चाहंे उनका कोई जनाधार हो या न हो।

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