जो कभी मंडल ‘अध्यक्ष’ नहीं बना, उसे बना दिया प्रदेश ‘अध्यक्ष’!

जो कभी मंडल ‘अध्यक्ष’ नहीं बना, उसे बना दिया प्रदेश ‘अध्यक्ष’!

जो कभी मंडल ‘अध्यक्ष’ नहीं बना, उसे बना दिया प्रदेश ‘अध्यक्ष’!


-जिसे संगठन चलाने का कोई अनुभव न रहा हो, वह कैसे प्रदेश संगठन चलाएगा? जो प्रदेष अध्यक्ष अपना पहला भाषण पढ़कर देगा, वह कैसे संगठन चलाएगा, उसे तो हमेशा दूसरों पर निर्भर रहना पड़ेगा

-चर्चा इस बात की हो रही है, कि आखिर भाजपा ने क्या देखकर पंकज चौधरी के हाथों में प्रदेश संगठन की बागडोर सौंप दी, जिले में तो इस बात की भी चर्चा हो रही है, कि इससे अच्छा अगर हरीष द्विवेदी को अध्यक्ष बना दिया होता, तो अच्छा था, कम से कम यह पर्ची पढ़कर भाषण तो नहीं देते

-जो कभी योगीजी के साथ मंच न साझा किया हो, वह कैसे मिलकर सरकार और संगठन चलाएगें, वैसे पंकज चौधरी के सिर पर हीरे का नहीं कांटों का ताज सजाया गया, जिसकी चुभन इन्हें तब तक रहेगी जब तक यह अध्यक्ष रहेगें

-पंकज चौधरी जब तक संजय चौधरी जैसे लोगों से घिरे रहेगें, तब तक वह न सिर्फ विवादों में रहेगें बल्कि आरोप भी लगेगा, संजय चौधरी की मंशा जोरदार नारा लगाकर और वीडियो वायरल कर पंकज चौधरी के खास होने का लोगों को एहसास कराना

बस्ती। पंकज चौधरी शायद प्रदेश के पहले ऐसे प्रदेष अध्यक्ष होगें, जिनके पास संगठन चलाने का कोई खास अनुभव नहीं हैं, जिला स्तरीय भी अनुभव नहीं। फिर भी इन्हें प्रदेश के संगठन का बागडोर सौंप दिया गया। यह पहले ऐसे प्रदेश अध्यक्ष भी बने हैं, जो इससे पहले मंडल अध्यक्ष तक नहीं बने। भाजपा ने पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर उन खाटी कार्यकर्त्ताओं और संगठन की सेवा में जीवन खपाने वालों को यह संदेश दिया है, कि जीवन खपाने और दरी बिछानेे में जवानी गंवाने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। क्यों कि भाजपा जो कहती है, वह करती नहीं हैें, और नहीं कहती है, वही करती है। जिले में इस बात की चर्चा गांव कस्बे से लेकर षहर तक में हो रही हैं, कि अगर बनाना ही था तो हरीश द्विवेदी को बना देते, कम से कम इनके पास संगठन चलाने का अपार अनुभव तो है, और यह कम से कम पढ़कर भाषण तो नहीं ही करते। कहा भी जाता है, कि जिसे संगठन चलाने का कोई अनुभव न रहा हो, वह कैसे प्रदेश संगठन चलाएगा? जो प्रदेश अध्यक्ष अपना पहला भाषण पढ़कर देगा, उससे क्यश उम्मीद की जा सकती? उसे तो हमेशा दूसरों पर ही निर्भर ही रहना पड़ेगा। जो कभी योगीजी के साथ मंच न साझा किया हो, वह कैसे मिलकर सरकार और संगठन चलाएगें? वैसे पंकज चौधरी के सिर पर हीरे का नहीं कांटों का ताज सजाया गया, जिसकी चुभन इन्हें तब तक रहेगी जब तक यह अध्यक्ष रहेगें। जिले के लोग कहते हैं, कि पंकज चौधरी जब तक संजय चौधरी जैसे लोगों से घिरे रहेगें, तब तक वह न सिर्फ विवादों में रहेगें बल्कि आरोप भी लगता रहेगा। संजय चौधरी की मंशा जोरदार नारा लगाकर और वीडियो वायरल कर पंकज चौधरी के खास होने का लोगों को एहसास कराना था, ताकि उसी की आड़ में पूरे प्रदेश को लूटा जा सके। जो व्यक्ति कभी अमित शाह जैसे नेता को गाली दे चुका हो, आज वह अमित शाह जिदांबाद का नारा लगा रहा है। राजनीति में इससे अधिक घिनौना सच सामने नहीं आ सकता। अब तो जो लोग संजय चौधरी को बधाई देते हैं, वह पहले विधायकजी कहते हैं, और उसके बाद बधाई देते है। यह तो तय है, कि अब जिले की राजनीति में काफी उधल पुधल होगा, इसका एहसास लोगों को बधाई के बैनर और पोस्टरों को देखकर लग जाता है। जिस तरह जिले के एक मात्र भाजपा विधायक अजय सिंह का फोटो गायब किया गया, उससे पता चलता है, कि क्या होने वाला है। यह वही विधायकजी है, जिन्होंने जिला पंचायत की बैठक में संजय चौधरी का बचाव करते हुए कहा था, कि अगर किसी ने इनके खिलाफ एक भी शब्द बोला तो उसकी जबान काट लूूंगा, आज उसी विधायक का फोटो गायब कर दिया। जिले में पंकज चौधरी के अध्यक्ष बनने पर कोई खास उत्साह न तो भाजपाईयों और न चौधरियों में देखने को मिला। पंकज चौधरी को यह याद रखना होगा कि हरीश द्विवेदी को हराने के लिए भाजपा के अनेक चौधरियों ने सपा के रामप्रसाद चौधरी का तन, मन, धन और बल तीनों से साथ दिया, आज भी वे लोग कहीं न कहीं रामप्रसाद चौधरी से जुड़े हुएं है। इनमें जिला पंचायत अध्यक्ष का भी नाम शामिल है। जिसने झंडा तो भाजपा का लगाया और सहयोग सपा को किया, ऐसे लोगों से निपटना पंकज चौधरी के लिए आसान नहीं होगा। एक तरह से कम से कम बस्ती मंडल तो पंकज चौधरी के लिए कांटों भरी राह होगी, जहां पर उन्हें हर कदम पर भीतरधाती नामक कांटा मिलेगा। कहा भी जाता है, अगर मंडल में रामप्रसाद चौधरी से टक्कर लेना है, तो रामप्रसाद चौधरी जैसा चौधरियों का नेता बनना पड़ेगा। पंकज चौधरी को पहले बस्ती में रामप्रसाद चौधरी जैसे चटटान से टकराना होगा। जिले में भाजपा का एक भी ऐसा कुर्मी नेता नहीं जिसे नेता कहा जा सकें, लेकिन सपा का हर विधानसभा में कुर्मियों का नेता और विधायक है। सत्ता के लालच में भले ही कुछ कुर्मी जुड़ जाएं लेकिन नाम से जुड़ना मुस्किल है। क्यों कि पंकज चौधरी सात बार तो सांसद बन गए, लेकिन इन 35 सालों में इन्होंने मंडल में एक भी कुर्मी सम्मेलन नहीं किया। जमीन तैयार करते-करते 27 आ जाएगा।

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