डाक्टर’ हो तो ‘डा. रमेश चंद्र श्रीवास्तव’ और ‘डा. वीके वर्मा’ जैसा!
- Posted By: Tejyug News LIVE
- राज्य
- Updated: 16 December, 2025 19:40
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‘डाक्टर’ हो तो ‘डा. रमेश चंद्र श्रीवास्तव’ और ‘डा. वीके वर्मा’ जैसा!
-दोनों डाक्टरों के प्रति मरीज का ऐसा अटूट विष्वास और रिष्ता बहुत कम देखने को मिलता, आज के दौर में भी मरीज इन दोनों डाक्टरों को भगवान से कम नहीं मानते
-जब तक डा. रमेष श्रीवास्तव चलते फिरते रहे, उन्होंने किसी मरीज से पैसा नहीं लिया, आज भी जब वह बीमार और मुंबई में इलाज करवा रहे तो भी वह बेड पर रहते हुए मरीजों का आनलाइन देखते और परामर्श देते
-डा. रमेश चंद्र के पदचिन्हृों पर डा. वीके वर्मा भी चल रहे हैं, बल्कि यह दो कदम आगे चल रहे, 36 साल से यह मरीज से फीस नहीं ले रहे, इनके अस्पताल में बेड और सर्विस चार्ज निःषुल्क, पैथालाजी का न्यूनतम लेते, 25 फीसद गरीब और असहाय मरीज ऐसे होते हैं, जिनसे यह जांच और दवा का पैसा भी नहीं लेते, लगभग 100 ऐसे मरीज और उनके परिवार हैं, जिन्हें अस्पताल में जीवनभर निःशुल्क इलाज चल रहा
-ब्रेन हैमरेज और पैरालाइज के कई ऐसे मरीज हैं, जिनके परिजन को बार-बार कहा जाता है, कि इन्हें लखनऊ किसी बड़े अस्पताल में ले जाइए, लेकिन कहते हैं, कि डाक्टर साहब मरीज तो कहीं नहीं जाएगा, यही पर इलाज होगा, जो होना होगा वह हो कर रहेगा, यह विष्वास ही है, जो मरीज ठीक भी होकर घर जा रहें
-डा. वीके वर्मा अब तक लगभग 13 लाख मरीजों का इलाज बिना फीस लिए कर चुके, एक-एक मरीज को चार से पांच मिनट तक देते हैं, और जब मरीज संतुष्ट हो जाता है, तब उसे डिस्चार्ज करतें
-इनके पास सबसे अधिक मरीज दूरदराज की बुजुर्ग महिलाएं ही आती है, भर्ती भी सबसे अधिक महिलाएं ही होती, ठीक होने पर डाक्टर साहब के सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देकर जाती
बस्ती। जब भी समाजसेवी के रुप में डाक्टर्स का नाम आएगा तो सबसे पहले डा. रमेशचंद्र श्रीवास्तव और डा. वीके वर्मा का नाम लिया जाएगा। देखा जाए तो समाज और मरीजों की ओर से जो मान और सम्मान मिला, इन दोनों को मिला, उतना किसी अन्य को नहीं मिला होगा। यह दोनों आज के लालची डाक्टरों की तरह कभी पैसे की ओर नहीं भागे, इन्होंने समाज सेवा को सर्वोपरि और सबकुछ माना। इन दोनों डाक्टरों के प्रति मरीज और समाज का जो अटूट विष्वास और रिष्ता है, वह बहुत कम डाक्टरों में देखने को मिलता है। असल में मरीज ऐसे डाक्टर्स को ही अपना भगवान मानते और समझते हैं। जब तक डा. रमेश श्रीवास्तव चलते फिरते रहे, उन्होंने किसी मरीज से पैसा नहीं लिया, मरीज को घर जाकर देखने का फीस नहीं लिया। जब यह बीमार हैं, और मुंबई में इलाज करवा रहे तो भी यह बेड पर रहते हुए मरीजों को आनलाइन देखते और परामर्श देते है। ऐसा समाजसेवी डाक्टर कहां मिलेगा। डा. रमेश चंद्र श्रीवास्तव के पदचिन्हृों पर डा. वीके वर्मा भी चल रहें हैं, बल्कि यह दो कदम आगे चल रहंे, 36 साल से यह मरीजों से फीस नहीं ले रहे, इनके अस्पताल में बेड और सर्विस चार्ज निःशुल्क, पैथालाजी का न्यूनतम चार्ज लिया जाता, 25 फीसद गरीब और असहाय मरीज ऐसे होते हैं, जिनसे यह जांच और दवा का भी पैसा नहीं लेते, लगभग 100 ऐसे मरीज और उनके परिवार हैं, जिनका यह सालों से निःशुल्क इलाज करते आ रहे। ब्रेन हैमरेज और पैरालाइज के कई ऐसे मरीज हैं, जिनके परिजन को बार-बार लखनऊ या दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में ले जाने की डाक्टर साहब सलाह देते हैं, लेकिन कहते हैं, कि डाक्टर साहब मरीज तो कहीं नहीं जाएगा, यहीं पर इलाज होगा, आप पर हमको पूरा भरोसा और विष्वास है, जो होना होगा वह यहीं पर होगा। इसी विष्वास के साथ मरीज ठीक भी होकर घर जा रहें है। डा. वीके वर्मा और उनकी टीम टूटने ने मरीजों का विष्वास टूटने नहीं दिया, भले ही चाहेें इसके लिए अस्पताल को नुकसान ही क्यों न उठाना पड़ा? अगर कोई समाज सेवी डाक्टर जिसने 36 साल की सेवा में 13 लाख गरीब मरीजों से एक रुपया भी फीस नहीं लिय हो बल्कि जिन मरीजों के पास वापस घर जाने का किराया न और दवा खरीदने को पैसा न रहा हो उसे किराया भी दिया और साथ में निःशुल्क दवा भी दिया। एक-एक मरीजों को यह चार से पांच मिनट देते हैं, जब तक पूरी तरह केस हिस्टी नहीं जान लेते तब तक यह मरीजों से पूछते रहते है। एक-एक मरीज को चार से पांच मिनट तक देते हैं, और जब तक मरीज पूरी तरह ठीक और संतुष्ट नहीं हो जाता, तब तक उसे डिस्चार्ज नहीं करतें। इनके पास सबसे अधिक मरीज दूरदराज की बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष ही इलाज और आपरेशन के लिए आते है। भर्ती भी सबसे अधिक महिलाएं और पुरुष ही होते हैं। ठीक होने पर डाक्टर साहब के सिर पर हाथ रखकर फलने-फूलने का आर्शीवाद भी देकर जाते हैं। अगर किसी भी व्यक्ति या डाक्टर्स को इस तरह का आर्षीवाद मिल जाए तो वह फलेगा भी और फूलेगा भी। डा. वीके वर्मा कहते हैं, कि उनके लिए मरीजों का आर्शीवाद बहुत बड़ी पूंजी है। ठीक होकर जाने वाले मरीजों में ब्रेन हैमरेज, फालिज, पथरी, गठिया और साईटिया के मरीज होते है।
गोटवा स्थित पटेल अस्पताल जिले का पहला ऐसा अस्पताल होगा, जहां पर 36 सालों में एक भी मरीज या उसके परिजन ने कोई हंगामा नहीं किया, और न किसी ने षिकायत ही किया, और न किसी ने पैसे के लिए ब्लैकमेल ही किया। पुलिस भी कभी नहीं आई। अगर किसी मरीज की इलाज के दौरान मौत हो भी गई, तो उसके लिए किसी परिजन डाक्टर वीके वर्मा और उनकी टीम को दोषी नहीं माना, बस यही कहते, कि भगवान को यही मंजूर था। इस अस्पताल में अल्टा साउंड से लेकर आईसीयू और एनआईसीयू एवं सर्जरी तक की सुविधा हैं। इतवार को डा. वीके वर्मा 12 से 14 घंटे तक निःशुल्क ओपीडी करते है। एक कमरे से क्लीनिक शुरु करने और गांव-गांव साइकिल से मरीज देखकर इस मुकाम पर पहुंचने वाले डा. वीके वर्मा, सही मायने में एक समाज सेवी है। जब इन्होंने देखा कि उनके क्षेत्र में शिक्षा का खासतौर से लड़कियों का कोई स्कूल नहीं तो इन्होंने सीमित संसाधनों में स्कूल खड़ा किया। शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति इनका लगाव 1989 से ही रहा। इन दोनों क्षेत्रों में इन्हें जितना पुरस्कार और सम्मान मिला, उतना शायद जिले में बहुत कम लोगों को मिला होगा। चाहें सामाजिक कार्य हो या फिर कोई खेलकूद का कार्यक्रम हो, इन्हें न सिर्फ हर जगह देखा जाता है, बल्कि कार्यक्रम को सफल बनाने में इनका आर्थिक रुप योगदान भी रहता। इनके पास कोई भी जरुरतमंद चला गया, उसे निराश नहीं होना पड़ा। दोनों डाक्टरों का व्यक्तित्व शानदार और जानदार है। लोगों का कहना है, कि ऐसे समाजसेवी डाक्टरों का समाज में रहना अति आवष्यक है। क्यों कि जिस तरह अधिकांश डाक्टर्स मरीजों का हर तरह से शोषण कर रहे हैं, उसे देखते हुए दोनों डाक्टरों का सलामत रहना जरुरी हैं, और अधिकांश गरीब मरीज दोनों डाक्टरों की की सलामती के लिए दुआ भी कर रही है।

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