अगले ‘जन्म’ में मोहे ईमानदार ‘एआर’ ‘डीएस’ और ‘सचिव’ पैदा ‘किजो’?
- Posted By: Tejyug News LIVE
- राज्य
- Updated: 30 December, 2025 19:04
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अगले ‘जन्म’ में मोहे ईमानदार ‘एआर’ ‘डीएस’ और ‘सचिव’ पैदा ‘किजो’?
बनकटी/बस्ती। अगर किसानों को सरकारी धान खरीद केंद्रों पर धान बेचना है, तो उन्हें धरना-प्रदर्शन करना होगा, यह हम नहीं बल्कि बनकटी के सैकड़ों धान बेचने वाले किसानों का कहना है, कहते हैं, कि अगर एक दिन पहले वे लोग सजनाखोर समिति के सचिव राम शरन के फर्जी धान खरीद को लेकर धरना-प्रदर्शन नहीं करते तो उनका धान दूसरे दिन नहीं खरीदा जाता। यह संदेश बनकटी के किसानों ने जिलेभर के उन किसानों को दिया, जिनका धान तो सचिव नहीं खरीदते अलबत्ता फर्जी अवष्य खरीदतें है। कहा कि अगर वह लोग धरना-प्रदर्शन नहीं करते तो पीसीएफ के डीएस, नायब तहसीलदार और लालगंज के दरोगा नहीं आते, और न इस बात का आष्वासन देते कि कल से सचिव धान खरीदेगें, इसी आष्वासन के बाद किसानों ने धरना-प्रदर्शन को समाप्त किया, और दूसरे दिन धान की खरीद होने लगी। जिस जिले में किसानों के धरना-प्रदर्शन के बाद धान की खरीद होती हो, उस जिले के डीएम, एडीएम, एआर और पीसीएफ के डीएस पर तो सवाल उठेगें हीं, जिन अधिकारियों पर सवाल उठ रहें हैं, उनसे किसान यह पूछता है, कि आप लोगों के रहने और न रहने से किसानों को क्या लाभ? जब किसानों को औने-पौने दाम में अड़तियों के हाथों बेचना ही है, तो सारे सेंटर को बंद कर दीजिए। किसान अधिकारियों से अधिक उन नेताओं को दोषी और जिम्मेदार मान रहे हैं, जिन लोगों ने किसानों को भ्रष्ट सचिवों और धान खरीद से जुड़े लापरवाह अधिकारियों के हवाले कर दिया। किसान भाजपा के उस टीम 11 पर भी सवाल उठा रहें हैं, कि आखिर टीम 11 क्या कर रही है? क्यों नहीं फर्जी धान खरीद को रोक रही है? और क्यों नहीं असली किसानों से धान खरीदने पर काम कर रही है? किसान उन पीसीएफ के डीएस और एआर को भी जिम्मेदार मान रही है, जो लोग लाखों लेकर पहले दागी सचिवों को धान खरीद प्रभारी बनाते हैं, और उसके बाद प्रति क्ंिवटल 100 रुपया लेकर बंदरबांट करते है। किसानों का कहना है, कि इन्हीं लालची अधिकारियों के चलते जिले में अब तक का सबसे बड़ा धान का घोटाला हुआ। उसके बाद भी जिम्मेदार नहीं जाग रहें हैं। कहा भी जाता है, कि जब तक जिम्मेदार सेंटर बेचना और प्रति क्ंिवटल 100 रुपया लेना नहीं छोड़ेगें, तब तक असली किसानों को अपना धान बेचने के लिए धरना-प्रदर्शन करना ही पड़ेगा। फर्जी धान खरीदना सचिवों की मजबूरी कहा जा सकता हैं, अगर वह फर्जी न खरीदे तो कैसे सेंटर का लाखों देगें और कहां से 100 रुपया प्रति क्ंिवटल बखरा देंगें? यह भी सवाल उठ रहा है, कि आखिर सचिव क्यों सेंटर बनाने के नाम पर बड़ी रकम देते हैं? और क्यों 100 रुपया प्रति क्ंिवटल बखरा देते हैं? कहा भी जाता है, कि जिस दिन सचिव सेंटर बनाने के नाम पर पैसा देना बंद कर दिया, उस दिन कईयों की दुकाने बंद हो जाएगी। आखिर किसी न किसी सचिव को तो सेंटर प्रभारी बनाना ही पड़ेगा। एक भी ऐसा सचिव सामने नहीं आया, जिसने यह कहा हो कि मैं पैसा नहीं दूंगा, भले ही चाहे सेंटर प्रभारी बनाइए या न बनाइए, और न ही सचिवों के संगठन के किसी पदाधिकारी ने ही कभी विरोध किया। जो पदाधिकारी अपने आप को सबसे बड़ा ईमानदार कहते हैं, वही सबसे बड़ा बेईमान निकलता। यह लोग इतना चालाक होते हैं, कि अपना कभी नहीं घोटाले में फंसते, यह लोग किसी और के नाम पर तिजोरी भरते हैं, और जब कभी वह फंस जाता है, तो पल्ला झाड़ लेते है। एआर और पीसीएफ के डीएस की ओर से भी ईमानदारी नहीं दिखाई दे रही हैं, ईमानदारी दिखाई दे तो कैसे? जब खुद बेईमान हैं। इतने बड़े धान घोटाले के बाद यह माना जाता था, कि अब तो पीसीएफ के डीएस और एआर कोई सबक लेगें, धन और राजनैतिक बल पर एआर तो कार्रवाई से बच गए, लेकिन कम से कम पीसीएफ के डीएस कैलाश कुशवाहा को तो पूर्व के डीएस अमित चौधरी से कुछ सबक लेना चाहिए था। दिक्कत यह है, कि जिस भी अधिकारी या फिर सचिव के खून में भ्रष्टाचार समा गया, वह चाहकर भी ईमानदारी नहीं बरत सकता। डीएम और एडीएम भले ही चाहे धान खरीद को पारदर्शी होने की बातें कहें, लेकिन सच्चाई वह हैं, जो किसान कह रहें है। वरना डीएम और एडीएम के रहते किसी की क्या मजाल कि वह एक क्ंिवटल भी फर्जी धान और गेहूं खरीद सके? किसानों के उस बात में दम लगता हैं, जिसमें यह कहा जाता हैं, कि जब तक सचिव संघ के पदाधिकारी ईमानदार नहीं होगें, तब तक उन्हें धान बेचने के लिए धरना-प्रदर्शन करना पड़ेगा। किसानों का कहना है, कि हो सकता है, कि अगले जन्म में जब सचिव, एआर और डीएस ईमानदार पैदा होगें, तो हो सकता है, कि उन्हें धरना-प्रदर्शन न करना पड़ें। इस जन्म में तो संभव ही नहीं।

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